कितनी तेज़ हवाए हैं

फिर भी दिए जलाए हैं

तारे क्या आसमान से
हम चाँद तोड़ लाए हैं

इन आँखों में देखो तो
कितने ख़्वाब समाए हैं

दिल के दरीचे पे हम ने
थोड़े दिए जलाए हैं

इन काँटों की राहों में
हम ने फूल बिछाए हैं

ख़्वाबों की ताबीरों को
पलकों तले छुपाए हैं

इस दिल के इक कोने में
कितने दर्द छुपाए हैं

दूर से देखो बादल तो
पर्बत से टकराए हैं

— Shivangi Shivi

More by Shivangi Shivi

Other ghazal from the same pen

See all from Shivangi Shivi →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling