हमारी हो रही चारों तरफ़ है किरकिरी शायद
ख़ुशी से चूम बैठा जब तुम्हारी ओढ़नी शायद
कभी बोसा,कभी आँसू, कभी तन्हाइयाँ देते
इसी से और बढ़ती जा रही है आशिक़ी शायद
तिरी तस्वीर दिखती है मिरी आँखों के जंगल में
जो बनकर नाचती रहती है जैसे मोरनी शायद
नहीं देती कभी जो भाव थी मासूम लड़कों को
वही पगली किसी की हो गई है ज़िन्दगी शायद
हुआ क्या है मुझे आख़िर उसी से बात करने को
मची रहती है सुब्ह-ओ-शाम दिल में खलबली शायद
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