"लड़के भी लड़के होते हैं"

हँसकर के कितना रोते हैं
लड़के भी लड़के होते हैं

आग दिलों में लगा रहे
ख़ुद को ख़ुद से भगा रहे
दिन दिन भर के दृश्य इन्हें
हैं रात रात भर जगा रहे

सपने सब पूरे करने हैं
ये नींद अधूरी सोते हैं

हँसकर के कितना रोते हैं
लड़के भी लड़के होते हैं

कुछ चाहा था जो मिला नहीं
पर उस का कोई गिला नहीं
गर वक़्त पलटता है अवश्य
तो हार कोई सिलसिला नहीं

इनको जो पाना होता है
उसपर सब कुछ खोते हैं

हँसकर के कितना रोते हैं
लड़के भी लड़के होते हैं

क़ुदरत का है अभिशाप इन्हें
मतलब रोना है पाप इन्हें
यदि दो आँसू दिख जाएँगे
दो जन्म हैं पश्चाताप इन्हें

ये सिरहाने वाले तकिए पर
आँख दबा कर सोते हैं

हँसकर के कितना रोते हैं
लड़के भी लड़के होते हैं

— Shobhit Dixit

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