कभी मैं शे'र कहता हूँ कभी गज़लें बनाता हूँसुख़न-वर मैं हूँ मुफ़लिस सो उसे ऐसे मनाता हूँहूँ घर के हाल से वाक़िफ सो रोटी को नहीं कहतामगर जब हद से बाहर हो तो बर्तन खनखनाता हूँ— Shoonya Shrey