है मुझे ये बद-गुमानी
कर रहा हूँ शेर-ख़्वानी
जावेदां ठहरी मोहब्बत
और ये दुनिया है फ़ानी
आँख से निकले भला क्या
हो चुका है ख़ून पानी
चाँद तारे, तेरा दामन
सारी बातें आसमानी
ठोकरें खाईं हैं दर दर
ख़ाक हर कूचे की छानी
क्या 'सुमित' करना है आगे
शा'इरी आतिश-फ़िशानी
— Sumit Panchal















