maano aadhe ghar ki vo poonji lagaakar deti hai | मानो आधे घर की वो पूंजी लगाकर देती है

  - Aarush Sarkaar

मानो आधे घर की वो पूंजी लगाकर देती है
माँ मिरी रोटी में अक्सर घी लगाकर देती है

उतना जी उसका किसी भी काम में नईं लगता है
वो दुआएं मुझको, जितना जी लगाकर देती है

वक़्त का इक दौर यूँँ भी सिमटा है मेरे हुज़ूर
छोटी बेटी माँ की अब चोटी लगाकर देती है

बाग के सब फूल मालन मुरझा ना जाएँ यूँँ भी
तू नज़र नईं डाले, बस पानी लगाकर देती है

सामने वो यूँँ मिरे डब्बा टिफ़िन का रखती थी
जैसे थाली खाने की बीवी लगाकर देती है

  - Aarush Sarkaar

Khushboo Shayari

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