हम परिंदों को आज़ाद करते रहे
कुछ नए ज़ख़्म ईजाद करते रहे
वो मुयस्सर हमें तो नहीं है मगर
उस के बोसे को हम याद करते रहे
उम्र भर बद दुआ ही मिली है मुझे
बे-वफ़ा बन के बे-दाद करते रहे
दिल हमारा कहीं टूट जाएँ न फिर
दिल सँभालो ये फ़रियाद करते रहे
ख़ुद-कुशी से उसे दुख हुआ ही नहीं
जान देने में इम्दाद करते रहे
वो किसी के कभी दिल से खेले नहीं
जो मिला उस को वो शाद करते रहे
— Tiwari Jitendra















