ना मंज़ूर ज़मीर के आगे
चाहे जाँ हो तीर के आगे
पँखो ने दम तोड़ दिया है
पैरो की जंज़ीर के आगे
आख़िर किस की चलती है फिर
मालिक की शमशीर के आगे
जिस दुनिया में इतना कुछ है
पर क्या है इक पीर के आगे ?
जो भी तेरे नाम चलेगा
आएँगे उस तीर के आगे
लाख बला के फिल्टर सिल्टर
कम, तेरी तस्वीर के आगे
हर ग़म का अब सब्र यही है
क्या मिलता तक़दीर के आगे ?
— Uday sharma















