न जाने कितनी रातों बा'द वो इक रात होती है
निगाहों की तेरे जब मुझ पे भी बरसात होती है
जमाना ढूँढ़ता है फिर तेरी गलियों में जा मुझ को
कहीं मैं खो सा जाता हूँ तेरी जब बात होती है
कभी तो मिल ही जाता था तू हफ़्ता बीत जाने पे
मुलाक़ात अब तो बस कहने ही भर की बात होती है
— Umashankar Lekhwar















