तुम्हारी बात पूरी इस सहर पहुँची नहीं है

हाँ तुम ने भेज दी चिट्ठी मगर पहुँची नहीं है

मुझे ये ग़म नहीं है ख़ुद-कुशी कर ली तो मैं ने
मुझे ये ग़म है बस वो क़ब्र पर पहुँची नहीं है

रही हैं झाँकती नींदें ये दरवाज़े पे यारों
मेरे बिस्तर पे नींदें रातभर पहुँची नहीं है

बला कोई न आए बस मिरे बच्चों के ऊपर
है माँ वो कौन जो हर एक दर पहुँची नहीं है

मिरे ही ऐब की सूची है सबके सामने पर
किसी तक मेरे फ़न की ये ख़बर पहुँची नहीं है

— Sarvesh Pandey

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