"निय्यत"
वक़्त भी ठहर जाता है इश्क़ की निय्यत देख कर
जैसे कोई ठहर जाए किसी की मय्यत देख कर
झूठ हम ने सुना था कि इश्क़ दौलत नहीं देखती
छोड़ गया वो मुझे किसी की हैसियत देख कर
कल तक जो मुझे अपना मानता था
बदल गई उन की नज़रें बुजुर्गों की वसीयत देख कर
हार ले कर मेरे क़ब्र पर आया था मेरा दुश्मन
बहुत दुखी हुआ मेरे ख़ैरियत देख कर
हम एक दिन हक़ीक़त में मर जाएँगे
किसी को सपनों में मय्यत देख कर
— Vikash krishiv















