लफ़्ज़ों में अब दिलों की सदाक़त नहीं रही
सो वहशत-ओ-जुनूँ सी मोहब्बत नहीं रही
जिस दिन से मेरे दिल से ये दुनिया निकल गई
उस दिन से फिर किसी से शिकायत नहीं रही
इस दर्जा शर्मसार हूँ अपनी ख़ताओं पर
दस्त-ए-दुआ उठाने की हिम्मत नहीं रही
मुस्लिम के दिल में ख़ौफ़ है ज़ालिम के ज़ुल्म का
अल्लाह के अज़ाब की दहशत नहीं रही
हर वक़्त यूँ सुबूत मोहब्बत का चाहिए
तो साफ़-साफ़ कह दो मोहब्बत नहीं रही
— Waseem Siddharthnagari















