बदलने का ज़माना है ज़रा बदलो
निकलकर भीड़ से अपनी फ़ज़ा बदलो
अभी इतना नहीं टूटा हुआ हूँ मैं
कि मुझ को देख कर तुम रास्ता बदलो
ज़माने की फ़ज़ा को अब हुआ क्या है
दु'आ पूरी न हो तो फिर ख़ुदा बदलो
मिला कर आँख वो हम से ये कहती है
'करन' ख़ुद को मिरी ख़ातिर ज़रा बदलो
— Karan Shukla















