kya ab bhi zinda hooñ main | क्या अब भी ज़िंदा हूँ मैं?

  - Vikas Sangam

क्या अब भी ज़िंदा हूँ मैं?

जब हाथों से मेरे सागर छूटा
पल भर में कोई सपना टूटा
मैं बिखरा हूँ वहीं आकर,
जहाँ से था ये अंकूर फूटा
मेरी मंज़िल की कोई राह नहीं
अब दूसरी कोई चाह नहीं
ख़्वाब आँखों के पीले हो गए
रेत के बंजर टीले हो गए
इतने ज़हर भरे हैं मुझ
में
ज़ख़्म सभी नीले हो गए
क्या अब भी ज़िंदा हूँ मैं?

  - Vikas Sangam

Khwab Shayari

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