कहीं कभी भी वो कहे मुझे किसी से प्यार है
तो यारों तब मुझे ही देखती वो बार-बार है
ये कहना उस सेे देर कर दी लौट आने में बहुत
मैं इन्तिज़ार में नहीं ना तेरी अब पुकार है
वो रूठी तो दरख़्त रूठे फिर परिंदे उड़ गये
मैं कैसे उसको रोकता कि तुम से मुझको प्यार है
तुम्हें भुला तो देता मैं मगर है मसअला ये है
कि मैं बे रोज़गार हूँ तू मेरा रोज़गार है
मैं बीच में हूँ तेरे ग़म को छोडूं तो ये लगता है
कि पीछे मेरा शव है आगे मेरी ही मज़ार है
कोई तो रुत बुलाए पेड़ों को हरा भरा करे
कि पेड़ों को परिंदों को मिलाने का ख़ुमार है
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