अगर मुझ को तेरा सहारा न हो

मिरा इस जहाँ में गुज़ारा न हो

वो हर बार ये कह के बख़्शे ख़ता
मगर याद रखना दुबारा न हो

न रख इश्क़ में फ़ाइदे की उमीद
अगर चाहता है ख़सारा न हो

मुक़द्दर भी उस को हराता नहीं
जिसे हार जाना गवारा न हो

कोई ऐसा फ़ातेह मुझे भी दिखा
कभी ज़िंदगी में जो हारा न हो

तवज्जोह तिरी चाहता हूँ मैं पर
तिरा ध्यान मुझ पे ही सारा न हो

बशर में हों चाहे हुनर लाख ही
पर एहसाँ जताने का यारा न हो

ये इंसाँ मिलेंगे तिरे दर पे ही
ब-जुज़ तेरे गर कोई चारा न हो

भँवर देखता है सफ़ीने को यूँ
समुंदर का गोया किनारा न हो

ख़ुदा-रा न तुम को मिले ऐसा शख़्स
तुम्हारा जो हो कर तुम्हारा न हो

मोहब्बत हो गर तो मोहब्बत हो बस
मोहब्बत का फिर गोशवारा न हो

इन आँखों से फिर पूछना मेरा हाल
जो हुलिए से गर आशकारा न हो

कहीं फिर दवा ज़हर लगने लगे
कोई ज़ख़्म इतना भी प्यारा न हो

— Zaan Farzaan

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