ब-ज़ाहिर है कि अब इस बार उदासी देर तक जाए

मगर इस बार डर भी है कि मेरी जाँ न थक जाए

ज़मीं वाले ज़मीं वालों के चक्कर में पड़ा है क्यूँ
कहीं तेरे न हाथों से निकल तेरा फ़लक जाए

नज़र इतना न आओ तुम कि फिर तुम को ही देखें सब
न जाने कौन कब किस की निगाहों में खटक जाए

बहुत सीधा है यूँ तो रास्ता रब तक पहुँचने का
मगर वो है तवील इतना कि मुझ जैसा भटक जाए

अँधेरे से घिरे इस दिल को बस तेरी ही हाजत है
तेरी ताबिंदगी-ए-हुस्न से हर शय चमक जाए

मिरी क़िस्मत की है नाराज़गी भी इस क़दर मुझ से
मैं जितना पास आ जाऊँ ये उतनी ही खिसक जाए

मैं क्यूँ थक हार कर बैठूँ कि बेहतर है वहाँ चल दूँ
जहाँ ले कर मुझे मेरी उमीदों की सड़क जाए

तुम आ जाओ मिलो मुझ से मगर इतना सुनो देखो
बहुत मुमकिन है आग इस जिस्म की यक-दम भड़क जाए

हसीं हो कर भी उस ने सिर्फ़ मुझ से ही मोहब्बत की
भला उस की वफ़ाओं पर मिरा कैसे न शक जाए

वो इक बच्चा जो अक्सर ही बड़ा होने से कतराए
कहो उस से सलीब-ए-वक़्त पर आ कर लटक जाए

तू इतनी ख़ूब-सूरत है कि तुझ को रिंद गर देखे
तो फिर बस इस क़दर देखे कि जाम उस का छलक जाए

मैं दूजों के ग़मों में ख़ूब रो लूँ पर ग़नीमत है
कभी ख़ुद के लिए मेरा इक आँसू भी टपक जाए

मिरे सब्र-ओ-तहम्मुल ज़ख़्म भी सारे मिटा देंगे
ख़याल इक ये नमक हर ज़ख़्म पर आ कर छिड़क जाए

अगर करनी मुझे आती तो मैं कब का न कर लेता
शुरू कर गुफ़्तुगू तू ही कि मेरी ये झिझक जाए

ज़रूरत तो मुझे होगी दलीलों की गवाहों की
तिरी पोशाक-ए-गिर्या तो तिरे हर ऐब ढक जाए

वो सब से आश्ना भी है तो इस में क्या नया है 'ज़ान'
वो है बरसात की ख़ुशबू जो हर इक सू महक जाए

— Zaan Farzaan

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