जतन कर के भी जब वो शय मिली ही नइं
तो कह डाला कि हाजत हम को थी ही नइं
अगरचे तू समझता है मिरी हर बात
मगर वो बात जो अब तक कही ही नइं
तअल्लुक़ वो बला है जो अगर टूटे
लगे कुछ दिन कि अब तो ज़िंदगी ही नइं
जो कर डाला तिरी आदत को मैं ने तर्क
किसी की फिर मुझे आदत लगी ही नइं
वफ़ा सीखे कोई मेरी उदासी से
ये जो आ कर कभी वापस गई ही नइं
जो तेरे बा'द अब आई है ख़ल्वत में
कोई इस से बड़ी आसूदगी ही नइं
जहाँ को छोड़ जब तरजीह दी ख़ुद को
जहाँ मुझ को लगा फिर लाज़मी ही नइं
रही हैं मुश्किलें काफ़ी सफ़र में पर
कभी भी ख़्वाहिश-ए-मंज़िल मरी ही नइं
वो क्या दिन थे अज़ीज़ इक आरज़ू थी ज़ान
पर अब वो आरज़ू बाक़ी रही ही नइं















