मौसम तो फिर मौसम है
बदला भी तो क्या ग़म है
तू बस वाजेह है मुझ को
बाक़ी दुनिया मुबहम है
ज़ुल्मत मुझ को यूँ चू
में
गोया मेरी बेगम है
ग़म की मुझ से निस्बत है
और ये निस्बत पैहम है
मुझ मुरझाए से गुल को
तेरा हँसना शबनम है
जीवन जिस को कहते हैं
मरने तक का मातम है
क्या फिर तर्क-ए-जज़्बा ही
दर्द-ए-दिल का मरहम है
सब उस का ग़ुस्सा देखें
गो आँख उस की पुरनम है
कल अश्कों से धोई थी
सूरत अब ताज़ा दम है
इतने ख़ुश क्यूँ दिखते हो
तुम को आख़िर क्या ग़म है
शहर-ए-दिल में मुद्दत से
बाद-ए-फ़रहाँ मद्धम है
इंसाँ के ख़ातिर इंसाँ
कुछ भी कर गुज़रे कम है















