सदा इस ने मुझे हिम्मत फ़राहम की
यही इक बात है अच्छी मिरे ग़म की
ख़िज़ाँ की रुत का सूखा गुल समझ मुझ को
अगर तू है घटा सावन के मौसम की
अब उस के बाद इन ज़ख़्मों से कैसा बैर
वो जब मरहम था तब हाजत थी मरहम की
तिरे पैकर को छूने की है मुझ को चाह
बड़ी दिल-चस्प है आग इस जहन्नम की
नवाज़िश जिन गुलों पर बाग़बाँ की हो
उन्हें क्या अहमियत क़तरा-ए-शबनम की
अलम था दाइमी सो इस पे क्या रोते
ख़ुशी जब भी मिली तो आँख पुर-नम की
फ़रिश्तों सा समझता है ये ख़ुद को 'ज़ान'
यही तो है ख़राबी इब्न-ए-आदम की
— Zaan Farzaan















