इन बिमारों से कभी तुम उस तरह से हाल पूछो
क्यूँँ न पूछे शख़्स किस सेे बात, उसका हाल पूछो
किस सदी में हो, कहीं भी ख़ुश-गवारी ना उसे तो
भीग अश्कों में कई दिन ओर कितने साल पूछो
ख़ुद-नुमाई कर रहा है शख़्स अब वो कुल्फ़तों की
वो नुक़ूशे-ज़ुल्म उसपर ज़ार तारी जाल पूछो
अश्क उतरे जो मिरे दिल के मगर उस तर्ज़ से के
जिस्म अपनों का मगर अनजान थी वो ख़ाल पूछो
दुश्मनों से मात खाई ना कभी उसने मगर हाँ
दे गए अपने शिकस्ते-इश्क़, क्या ख़ुश-हाल पूछो
शख़्स को उम्मीद दिखलाई न क्यूँ पहले किसी ने
मौत अव्वल रूह देखे, जिस्म फिर बेहाल पूछो
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