
देखे जाते नहीं जब बुझते दियों के मंज़र
कैसे देखोगे तुम उन जलते घरों के मंज़र
पैरवी फूलों की हम यूँ ही नहीं करते हैं
हम ने देखें हैं बहुत कटते सरों के मंज़र
— Mohammad Aquib Khan
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