Mohammad Aquib Khan

Mohammad Aquib Khan

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Mohammad Aquib Khan shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Mohammad Aquib Khan's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

ज़हीन तो नहीं हैं हम, मगर ज़माने में कहाँ पे, किस से है क्या, बोलना समझते हैं — Mohammad Aquib Khan
उन दिनों इतनी तरक्की तो नहीं थी 'आक़िब' हाँ मगर लोग मददगार हुआ करते थे — Mohammad Aquib Khan
किसी ने बस्ते को ठुकराया और जुर्म चुना किसी ने जेल में रह कर पढ़ाई पूरी की — Mohammad Aquib Khan
ज़ालिम से डरने वालों ज़रा याद तो करो थी सैंकड़ो की फ़ौज बहत्तर के सामने — Mohammad Aquib Khan
ख़लवत मिली किसी को किसी को शरीक-ए-जाँ राह-ए-वफ़ा से कोई कुँवारा नहीं गया — Mohammad Aquib Khan
रोज़ तकते हैं मेरी राह वो लौट आने की लेनदार अब तो मुझे माँ की तरह लगते हैं — Mohammad Aquib Khan
तुम ख़ुद ही जान जाओगे फिर हाल-ए-दिल मेरा मैं ने जो दी थी तुम को किताबें, पढ़ा करो — Mohammad Aquib Khan
रक़्स करते हैं सारे बंदर हैं वो जो ऊपर है ना मदारी है — Mohammad Aquib Khan
कभी सहराओं में भी बारिश हो वो भी देखें कभी मुझे छत से — Mohammad Aquib Khan
तुम अपना दीन दिखाओ उसे, मोहब्बत भी गले लगाओ मगर पहले तुम सलाम करो — Mohammad Aquib Khan
वो चोर कोई सूरमा लगता है कहीं का ज़ेवर न चुरा पाया तो शमशीर चुरा ली — Mohammad Aquib Khan
दिल से कैसा है ये मालूम नहीं, पर वो शख़्स शक्ल से साहिब-ए-ईमान नज़र आता है — Mohammad Aquib Khan
याद आ जाती है बाबा की अचानक से हमें जब किसी टीम का कप्तान नज़र आता है — Mohammad Aquib Khan
आशिक़-ए दीन-ए-ग़ज़ल के लिए कु़रआँ है वो अब जिसे मीर का दीवान कहा जाता है — Mohammad Aquib Khan
जहाँ वालों बहुत आला है ये दिन हुए थे आज 'आक़िब ख़ान' पैदा — Mohammad Aquib Khan
मेरे माँ बाप अनपढ़ हैं मगर वो मेरे चेहरे को पढ़ना जानते हैं — Mohammad Aquib Khan
सब उजली साड़ियों के कारोबारी हर इक औरत को बेवा चाहते हैं — Mohammad Aquib Khan
पेड़ हम ने थे लगाए पर मिली हैं गुठलियाँ हिस्से में 'आक़िब' हमारे आम आए न कभी — Mohammad Aquib Khan
तुम अपने लहजे पे थोड़ा सा इख़्तियार रखो वगरना लोग उठाएँगे परवरिश पे सवाल — Mohammad Aquib Khan

Ghazal

हाथ से हाथ मेरे रोज़ मिलाने वाला छोड़ कर जा रहा है मुझ को सताने वाला एक मुद्दत से नहीं रूठा नहीं रोया मैं जानता हूँ है नहीं कोई मनाने वाला आज महफ़िल में मुझे टूट बिखर जाना है आज मैं शे'र नहीं कोई सुनाने वाला रास्ते में हूँ खड़ा तन्हा,अकेला,गुम-सुम राह से गुम है मुझे राह बताने वाला आप की चाहतों में छोड़ दें दुनिया लेकिन है नहीं घर में कोई और कमाने वाला ख़्वाब जो टूट गया इस में शिकायत कैसी ख़्वाब तो तोड़ता है ख़्वाब दिखाने वाला एक तो उस की तगाफुल भी मेरी दुश्मन है और ऊपर से है वो ऊँचे घराने वाला भाई को भाई से उलझा के लड़ा कर देखो तख़्त पर बैठ गया ख़ून बहाने वाला — Mohammad Aquib Khan
मुद्दत किसी की छाँव में बचपन गुज़ार कर अब जा रहे हैं पेड़ से झूला उतार कर जंगी रिवायतों को न यूँँ तार तार कर गर हौसला है तुझ में तो सीने पे वार कर इक शहर जिस में हम अदू से जीत कर बसे वो शहर छोड़ना पड़ा अपनों से हार कर ये वो वबा है जिस में कयामत की है झलक कुछ फ़ाएदा नहीं है किसी को पुकार कर ऐ मौज आज मानते हैं तुम को नाख़ुदा चाहे डुबा दे मुझ को या दरिया के पार कर नफरत की बारिशों में सियासत की राह पर आदम तू अपने बर्ग ए गुलों को ना खार कर स्याही नहीं मैं अपने लहू से लिखूँ ग़ज़ल इक बार मेरे सामने तू ज़िक्र ए यार कर — Mohammad Aquib Khan
कितना खेंचेगी हमें ज़िन्दगी मालूम नहीं कब तलक रोज़ करे ख़ुद-कुशी मालूम नहीं मशवरा दे रहे हैं ऐसे भी कुछ लोग हमें आप और तुम का जिन्हे फ़र्क़ भी मालूम नहीं आप दरिया को मेरे पास ले कर आए हैं आप लोगों को मेरी तिशनगी मालूम नहीं अब तसव्वुर में भी वो शख़्स नहीं आता है कितनी कर पाएँगे हम शा'इरी मालूम नहीं काश वो आएँ कभी और कहें के पहचाना और फिर हम कहें के जी नहीं मालूम नहीं एक भटके से मुसाफिर सा मेरा हाल है अब कशतियों का पता है पर नदी मालूम नहीं चापलूसी नहीं की काम किया है मैं ने क्या रहेगी मेरी अब नौकरी मालूम नहीं अपने बच्चों के लिए जंग को छोड़ आए हम ये दिलेरी है या है बुज़दिली मालूम नहीं इम्तिहाँ में भला क्यूँ ही नहीं सर पटके हम एक ही आया सवाल और वही मालूम नहीं रोज़ ज़ख़्मों में नए ज़ख़्म निकल आते हैं किस ने की थी मेरी चारागरी मालूम नहीं कैसे हम नाज़ करें ऐसी ख़ुशी पर 'आक़िब' दायमी है, के है ये आरजी मालूम नहीं — Mohammad Aquib Khan
क्यूँ किसी से करे रंजिशें क्यूँ किसी से अदावत करें जो मेरा था मेरा ना हुआ क्या किसी से शिकायत करें खूँ के आँसू रुलाता रहा तीर दिल पर चलाता रहा इश्क़ ने ज़ुल्म इतने किए कैसे इस की हिमायत करें प्यार के वास्ते ना सही एक मेरी ख़ुशी के लिए आपसे है यही इल्तिजा बस जनाज़े पे शिरकत करें ये भी हो सकता है छीन ले उस को ख़ुद के लिए या तो फिर जो हुआ सो हुआ बोलकर उम्र भर हम नदामत करें इस ज़मीं पर ही पैदा हुए इस ज़मीं पर ही मरना है अब है ये मुमकिन नहीं हुक्मराँ के कहीं और हिजरत करें बा'द तकसीम के रात भर हम ये सजदे में कहते रहे ऐ ख़ुदा मेरे मेहबूब की आँसुओ से हिफ़ाज़त करें ज़िन्दगी में फ़क़त इतनी सी कामयाबी मुझे चाहिए लोग दे बद-दुआ मुझ को पर जब मिले मुझ सेे हैरत करें — Mohammad Aquib Khan
बुलंद हौसले थे और जाँ फिशानी थी बहुत हसीन हमारी कभी जवानी थी वो एक दौर था ज़ब उड़ने वाले घोड़े थे वो रोज़ रात को परियों की इक कहानी थी इसी लिए भी मरासिम नहीं बढे उस सेे बहुत हसीन थी वो और ख़ानदानी थी नया है दौर मगर लोग तो नहीं बदले वही हमारी है जो 'कैस' की कहानी थी वो जिस ग़ज़ल पे मिरे होंठ काँपते हैं अब कभी ग़ज़ल वो हमें याद बाज़ुबानी थी तुम्हारे बा'द तुम्हारी वो दिलपसंद फ़िलम किसे दिखा रहे हैं और किसे दिखानी थी बड़ों से गुफ्तुगू का आज जो तरीका है हमारे दौर में बूढ़ो से बदज़बानी थी जो एक शख़्स गया है न छोड़ कर मुझ को उसी के साथ हमें ज़िन्दगी बितानी थी — Mohammad Aquib Khan
वैसे तुम्हारे वास्ते ज़्यादा नहीं किया बस उम्र भर किसी को भी अपना नहीं किया हम आज तलक सुन रहें हैं ता'ने लोगों के लेकिन तुम्हें कभी कहीं रुस्वा नहीं किया ना दोस्ती न इश्क़ न ही क़त्ल कर सके तुम ने तो कोई काम भी पूरा नहीं किया ये मानते है हम के फ़रेबी बहुत हैं पर हम ने ज़मीर का कभी सौदा नहीं किया पूछा जो हम ने उस सेे तो बोला वो इश्क़ है हाँ उस ने मगर इश्क़ का वा'दा नहीं किया जो जा रहा था उस को ख़ुशी से किया विदा हम ने किसी की कार का पीछा नहीं किया मैं ख़ुद ही देखूँ सारे सितम उस ने इस लिए बेजान कर दिया मगर अंधा नहीं किया हम ने बुरे को बोला बुरा पिछली सफ से भी अगली सफों में बैठ के मुजरा नहीं किया — Mohammad Aquib Khan
किसी के वास्ते मुश्किल किसी का आसरा दरिया मेरी मंज़िल किनारा है मेरा है रास्ता दरिया मेरा कोई नहीं है जो मुझे ग़म में दिलासा दे यहीं दरिया निकलता है यहीं फिर सूखता दरिया तिलिस्मी तुम इशारे कर बुलाओ ना मुझे ऐसे मेरा दिल मोम-सा है और मोहब्बत आग का दरिया तुम्हारा ही सिला जानम नदी में जो रवानी है कभी उस ओर जाना तुम तुम्हें देगा दुआ दरिया तेरे बस एक कहने पर सभी को छोड़ आए हम मगर अब याद आता है मेरा लश्कर मेरा दरिया तुम्हारे बिन हमारा घर बसाना ऐसा है जैसे सलाम ए आख़िरी कर के समुंदर में मिला दरिया — Mohammad Aquib Khan

Nazm

'कोट' याद है वो कोट जो मैं ने तेरे कहने पे सिलवाया था अपनी शादी पे पहनूंगा ये दोस्तों को बतलाया था तेरे छोड़ जाने के बा'द वो कोट किसी कोने में बेजान सा पड़ा है रोज़ मुझ सेे आँखें मिला कर कहता है तू खुदगर्ज बड़ा है वो कहता है के जब सिलवाया है तो पहन के देख ले मुझ को नहीं तो फिर किसी मुफलिस के लिए बाहर फेंक दे मुझ को आज बड़े अरसे बा'द अलमारी से उस पुराने कोट को निकाला है जिस ने आज भी अपनी जेबों में तेरी यादों को सँभाला हैं देख कर आईने को कोट बोला वाह मियाँ क्या खूब लगते हो कहाँ जाने का इरादा है जो इतनी शिद्दत से सजते हो बोल पड़े हम कोट से के आज तेरा क़र्ज़ उतार कर आएँगे आज तुझ को पहन के हम उस बे-वफ़ा की शादी में जाएँगे — Mohammad Aquib Khan