'कोट'
याद है वो कोट जो मैं ने तेरे कहने पे सिलवाया था
अपनी शादी पे पहनूंगा ये दोस्तों को बतलाया था
तेरे छोड़ जाने के बा'द वो कोट किसी कोने में बेजान सा पड़ा है
रोज़ मुझ से आँखें मिला कर कहता है तू खुदगर्ज बड़ा है
वो कहता है के जब सिलवाया है तो पहन के देख ले मुझ को
नहीं तो फिर किसी मुफलिस के लिए बाहर फेंक दे मुझ को
आज बड़े अरसे बा'द अलमारी से उस पुराने कोट को निकाला है
जिस ने आज भी अपनी जेबों में तेरी यादों को सँभाला हैं
देख कर आईने को कोट बोला वाह मियाँ क्या खूब लगते हो
कहाँ जाने का इरादा है जो इतनी शिद्दत से सजते हो
बोल पड़े हम कोट से के आज तेरा क़र्ज़ उतार कर आएँगे
आज तुझ को पहन के हम उस बे-वफ़ा की शादी में जाएँगे















