अँधों को नूर, मय-कदों को जाम दे गई
वो जिस तरफ़ से गुज़री हसीं शाम दे गई
नुक्कड़ पे बैठ कर उसी की राह देखना
बेरोज़गार हम थे हमें काम दे गई
सब जानते थे बस्तियाँ किस ने जलाई हैं
लेकिन हवा चराग़ पे इल्ज़ाम दे गई
फ़रहाद, मजनू, कैस, दिवाना, शिकस्ता दिल
वो जाते जाते मुझ को कई नाम दे गई
दो गज़ जमीँ, सफ़ेद कफ़न, बदहवा से लाश
मौत आई और ज़िन्दगी का दाम दे गई
— Mohammad Aquib Khan















