छीन कर हक़ किसी का जश्न-ए-बहारा कर लें
इस से बेहतर है दो रोटी पे गुज़ारा कर लें
एक लम्हे को सही रेत पे तो आती है
हम समुंदर से भला कैसे किनारा कर लें
डूबना तैरना सब आप के ही ऊपर है
आप गर चाहें तो तिनके को सहारा कर लें
जिस्म से जान कभी भी जुदा हो सकती है
इस लिए केहते है आओ के कफारा कर लें
क्या ज़रूरी है के हर रात सितारे आएँ
रौशनी के लिए जुगनू से शरारा कर लें
मेरा माज़ी मेरे अमरोज़ का भी है दुश्मन
और वो कहते हैं के इश्क़ दुबारा कर लें
— Mohammad Aquib Khan















