मुद्दत किसी की छाँव में बचपन गुज़ार कर
अब जा रहे हैं पेड़ से झूला उतार कर
जंगी रिवायतों को न यूँ तार तार कर
गर हौसला है तुझ
में तो सीने पे वार कर
इक शहर जिस
में हम अदू से जीत कर बसे
वो शहर छोड़ना पड़ा अपनों से हार कर
ये वो वबा है जिस
में कयामत की है झलक
कुछ फ़ाएदा नहीं है किसी को पुकार कर
ऐ मौज आज मानते हैं तुम को नाख़ुदा
चाहे डुबा दे मुझ को या दरिया के पार कर
नफरत की बारिशों में सियासत की राह पर
आदम तू अपने बर्ग ए गुलों को ना खार कर
स्याही नहीं मैं अपने लहू से लिखूँ ग़ज़ल
इक बार मेरे सामने तू ज़िक्र ए यार कर
— Mohammad Aquib Khan















