प्यार से जब कोई बुलाता है
क्यूँ मुझे तू नज़र सा आता है
जिस जगह तेग़ हार जाती है
वो वहाँ हँस के जीत जाता है
सारे त्यौहारों के इ'लावा दिल
एक दिन हिज्र भी मनाता है
'मीर' उस को पसंद है पर वो
शे'र मेरे भी गुन'गुनाता है
उस को मालूम है मनाएंगे हम
इस
लिए भी वो रूठ जाता है
उस को आती नहीं है तेग़ज़नी
वो मगर सूरमा बनाता है
शे'र उसपर मैं जब सुनाता हूँ
ज़ोर से तालियाँ बजाता है
— Mohammad Aquib Khan















