कितना खेंचेगी हमें ज़िन्दगी मालूम नहीं

कब तलक रोज़ करे ख़ुद-कुशी मालूम नहीं

मशवरा दे रहे हैं ऐसे भी कुछ लोग हमें
आप और तुम का जिन्हे फ़र्क़ भी मालूम नहीं

आप दरिया को मेरे पास ले कर आए हैं
आप लोगों को मेरी तिशनगी मालूम नहीं

अब तसव्वुर में भी वो शख़्स नहीं आता है
कितनी कर पाएँगे हम शा'इरी मालूम नहीं

काश वो आएँ कभी और कहें के पहचाना
और फिर हम कहें के जी नहीं मालूम नहीं

एक भटके से मुसाफिर सा मेरा हाल है अब
कशतियों का पता है पर नदी मालूम नहीं

चापलूसी नहीं की काम किया है मैं ने
क्या रहेगी मेरी अब नौकरी मालूम नहीं

अपने बच्चों के लिए जंग को छोड़ आए हम
ये दिलेरी है या है बुज़दिली मालूम नहीं

इम्तिहाँ में भला क्यूँ ही नहीं सर पटके हम
एक ही आया सवाल और वही मालूम नहीं

रोज़ ज़ख़्मों में नए ज़ख़्म निकल आते हैं
किस ने की थी मेरी चारागरी मालूम नहीं

कैसे हम नाज़ करें ऐसी ख़ुशी पर 'आक़िब'
दायमी है, के है ये आरजी मालूम नहीं

— Mohammad Aquib Khan

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Adaa Shayari

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