ख़ुदा का घर अगर कोई नहीं है

दिखा मुझ को कि डर कोई नहीं है

उड़ी दरगाह की चादर हवा में
बता मौला का दर कोई नहीं है

सभी भगवान जब इंसान में हैं
तो क्या आदर्श नर कोई नहीं है

सिखाते हैं ग़ज़ल कहना वो हम को
अभी जिन को हुनर कोई नहीं है

धरा पर मोक्ष है अपना बनारस
बनारस सा नगर कोई नहीं है

बहुत सारे मकाँ परदेस में हैं
मगर घर सा शजर कोई नहीं है

नवाज़िश आप की है सामने हूँ
इधर इल्म-ओ-हुनर कोई नहीं है

— Shubham Rai 'shubh'

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Khuda Shayari

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