alag jaa.e zamaana to ha | अलग जाए ज़माना तो हमें क्या ग़म

  - Shubham Rai 'shubh'

अलग जाए ज़माना तो हमें क्या ग़म
बहक जाए दिवाना तो हमें क्या ग़म

घमंडी है, फ़रेबी है, छली है वो
नहीं है दोस्ताना तो हमें क्या ग़म

मिले सब कुछ मगर वो अब नहीं, चाहे
पड़े सब कुछ लुटाना तो हमें क्या ग़म

निकाला है उसे अब बा-ख़बर होकर
नहीं है दिल लगाना तो हमें क्या ग़म

ख़ुशी से लिख रही है ये क़लम अब शुभ
नहीं अपना ठिकाना तो हमें क्या ग़म

  - Shubham Rai 'shubh'

Aashiq Shayari

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