डरावनी है जो तुझ को तिरी क़ज़ा ही न होन भाग इतना कि अंजाम का पता ही न होदिखावे की होड़ में क्या मिले नहीं आप सेदिखा रहे जैसे कुछ भी अता पता ही न हो— Shubham Rai 'shubh'