गिला है न शिकवा है कोई
रक़ीबों में अपना है कोई
वो आला या अदना है कोई
वो दावा-ए-तक़्वा है कोई
वो आवाज़ देता नहीं अब
मुझे यूँँ भी रखता है कोई
ये दामन अगर तुम हटा दो
तो जाने कि सपना है कोई
नया साल आने को है अब
तेरी राह तकता है कोई
ये ज़ुल्म-ओ-सितम क्या है आमिर
यूँँ वहशत भी लिखता है कोई
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