राह में बैठा हूँ ज़माने से
काश आएँ किसी बहाने से
इन बुतों में ये ख़ासियत देखी
रूठते और हैं मनाने से
'इश्क़ की आग ऐसी आग है जो
और लगती है ये बुझाने से
रिश्तों की डोरी है बहुत नाज़ुक
टूट जाती है आज़माने से
कोई इक बार गर चला जाए
फिर नहीं आता वो बुलाने से
आपकी कोशिशें फ़ज़ूल है ये
'इश्क़ छुपता नहीं छुपाने से
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