सच्चे को झूटा झूटे को सच्चा कह नहीं पाओगे
आईनों की सोहबत से ख़ुद आईना बन जाओगे
हरे भरे गाँवों को छोड़ा तो तय है पछताओगे
पत्थर के शहरों में रहोगे तो पत्थर बन जाओगे
चाहत वाला खेला दिल से खेला तो मुश्किल होगी
पाग़ल-वाग़ल हो के दीवारों से सर टकराओगे
आँखें खोलोगे तब ही जानोगे कि जंग जारी है
आँखें मूँदे बैठे रहने से तो मारे जाओगे
सीधी सीधी टक्कर लेना ही होगी जल्लादों से
अब के भी गर चुप्पी साधोगे तो मारे जाओगे
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