फ़स्ल-ए-गुल है समाँ है मस्ताना
आज फिर दिल हुआ है दीवाना
यूँ तो हर आँख में नशा लेकिन
उन की आँखों में पूरा मयखाना
जबसे आए हैं उन को महफ़िल में
भूल बैठे हैं यार घर जाना
उन की महफ़िल में वो सुकून ए दिल
जैसे महफ़िल नहीं हो बुत़खाना
क़ातिलाना है हर अदा उन की
जान-लेवा है उन का शर्माना
हम से पूछो न ज़ीस्त का आज़ी
हम ने कैसे पिया है पैमाना
— Ajeetendra Aazi Tamaam















