"माचिस"
जिस्म जैसे की हो माचिस कोई
साँसें बारूद, तीलिओं की तरह
साँस दर साँस घिसती जाती है
जिस्म जलते हैं चराग़ों की तरह
हर इक पल ख़ाक होती हैं 'उम्रें
हर इक पल ज़िंदगी सँवरती है
हर इक चेहरा बुझा सा लगता है
ज़िंदा हैं लोग मज़ारों की तरह
फ़क़त बेचैनी है यूँ नस नस में
बारहा सर फटा सा जाता है
बस इक सिगरेट जलाने की ख़ातिर
तलब है माचिस की पागलों की तरह
तलब है माचिस की पागलों की तरह
— Ajeetendra Aazi Tamaam














