
नदी जो बह रही थी आज कल ठहरी हुई है
कहानी चोट खा खा कर ही तो गहरी हुई है
मिरी जाँ इतनी जल्दी थक गए तुम ज़िंदगी से
अभी तो ज़िंदगी की बस याँ दोपहरी हुई है
— Ajeetendra Aazi Tamaam
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