"इक जोगी इक टीले पर"

इक जोगी इक टीले ऊपर जाने क्या क्या बकता है
वस्त्र उतारे बैठा है और चाँद सितारे तकता है

झिलमिल झिलमिल तारे कुछ हँसते हैं कुछ मुस्काते हैं
चाँद बड़ा इतराता है और जुगनू गीत सुनाते हैं

उन गीतों की परतें धीमे धीमे कर के खुलती हैं
मिश्री जैसी जोगी की हर बात में आ कर घुलती हैं

पेड़ भी जोगी को सुनने को हल्का सा झुक जाता है
पेड़ का पत्ता पत्ता चाँद का आईना बन जाता है

एक शम्अ' है जो बस जोगी को ही तकती जाती है
देख के जोगी को वो कुछ बलखाती है शरमाती है

कुछ परवाने शम्अ' के शरमाने से मर जाते हैं
कुछ परवाने बस जोगी की बातें सुनने आते हैं

नींद भी जोगी की बातों से मनमोहित हो जाती हैं
धीमे धीमे चुपके चुपके जोगी में खो जाती है

रात का घूँघट गिरता है सूरज का नूर सताता है
जोगी आधी आँखें खोले उठता है मुरझाता है

कोट पहन कर टाय पहन कर लौट के दफ़्तर जाता है

— Yusha Abbas 'Amr'

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