itna to dosti ka sila deejie mujhe | इतना तो दोस्ती का सिला दीजिए मुझे

  - Abdul Hamid Adam

इतना तो दोस्ती का सिला दीजिए मुझे
अपना समझ के ज़हर पिला दीजिए मुझे

उट्ठे न ताकि आप की जानिब नज़र कोई
जितनी भी तोहमतें हैं लगा दीजिए मुझे

क्यूँ आप की ख़ुशी को मेरा ग़म करे उदास
इक तल्ख़ हादिसा हूँ भुला दीजिए मुझे

सिदक़-ओ-सफ़ा ने मुझ को किया है बहुत ख़राब
मक्र-ओ-रिया ज़रूर सिखा दीजिए मुझे

मैं आप के क़रीब ही होता हूँ हर घड़ी
मौक़ा कभी पड़े तो सदा दीजिए मुझे

हर चीज़ दस्तियाब है बाज़ार में 'अदम'
झूटी ख़ुशी ख़रीद के ला दीजिए मुझे

  - Abdul Hamid Adam

More by Abdul Hamid Adam

As you were reading Shayari by Abdul Hamid Adam

    ऐ ग़म-ए-ज़िंदगी न हो नाराज़
    मुझ को आदत है मुस्कुराने की
    Abdul Hamid Adam
    67 Likes
    गो तिरी ज़ुल्फ़ों का ज़िंदानी हूँ मैं
    भूल मत जाना कि सैलानी हूँ मैं

    ज़िंदगी की क़ैद कोई क़ैद है
    सूखते तालाब का पानी हूँ मैं

    चाँदनी रातों में यारों के बग़ैर
    चाँदनी रातों की वीरानी हूँ मैं

    जिस क़दर मौजूद हूँ मफ़क़ूद हूँ
    जिस क़दर ग़ाएब हूँ लाफ़ानी हूँ मैं

    मुझ को तन्हाई में सुनना बैठ कर
    मुतरिब-ए-लम्हात-ए-वजदानी हूँ मैं

    जिस क़दर करता हूँ अंदेशा 'अदम'
    उस क़दर तस्वीर-ए-हैरानी हूँ मैं

    अक़्ल से क्या काम मुझ नाचीज़ का
    एक मा'मूली सी नादानी हूँ मैं

    हूँ अगर तो हूँ भी क्या इस के सिवा
    क़ीमती विर्से की अर्ज़ानी हूँ मैं

    दिल की धड़कन बढ़ती जाती है 'अदम'
    किस हसीं के ज़ेर-ए-निगरानी हूँ मैं
    Read Full
    Abdul Hamid Adam
    जब तिरे नैन मुस्कुराते हैं
    ज़ीस्त के रंज भूल जाते हैं

    क्यूँ शिकन डालते हो माथे पर
    भूल कर आ गए हैं जाते हैं

    कश्तियाँ यूँ भी डूब जाती हैं
    नाख़ुदा किस लिए डराते हैं

    इक हसीं आँख के इशारे पर
    क़ाफ़िले राह भूल जाते हैं
    Read Full
    Abdul Hamid Adam
    कहते हैं उम्र-ए-रफ़्ता कभी लौटती नहीं
    जा मय-कदे से मेरी जवानी उठा के ला
    Abdul Hamid Adam
    43 Likes
    हँस हँस के जाम जाम को छलका के पी गया
    वो ख़ुद पिला रहे थे मैं लहरा के पी गया

    तौबा के टूटने का भी कुछ कुछ मलाल था
    थम थम के सोच सोच के शर्मा के पी गया

    साग़र-ब-दस्त बैठी रही मेरी आरज़ू
    साक़ी शफ़क़ से जाम को टकरा के पी गया

    वो दुश्मनों के तंज़ को ठुकरा के पी गए
    मैं दोस्तों के ग़ैज़ को भड़का के पी गया

    सदहा मुतालिबात के बा'द एक जाम-ए-तल्ख़
    दुनिया-ए-जब्र-ओ-सब्र को धड़का के पी गया

    सौ बार लग़्ज़िशों की क़सम खा के छोड़ दी
    सौ बार छोड़ने की क़सम खा के पी गया

    पीता कहाँ था सुब्ह-ए-अज़ल मैं भला 'अदम'
    साक़ी के ए'तिबार पे लहरा के पी गया
    Read Full
    Abdul Hamid Adam

Similar Writers

our suggestion based on Abdul Hamid Adam

Similar Moods

As you were reading undefined Shayari