धरी हुई है तराज़ू में एक हाथ पे बात

कि कोई लाए तवाज़ुन को मेरी बात पे बात

मैं एक पल से दुबारा गुज़रना चाहता हूँ
उसे बुलाओ जो करता था मुम्किनात पे बात

विदाअ होने के लम्हे पे तू ने दिल खोला
सो मुझ को सुनना पड़ी रुक के पुल-सिरात पे बात

सो ये तो निमटा कि इंकार तो नहीं है तुम्हें
अब आओ बैठ के करते हैं मुश्किलात पे बात

— Abid Sial

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