किस क़दर दिल को दुखाते हैं ज़माने वाले
देख तो ज़ख़्म उभर आए पुराने वाले
राहज़न तो अरे बदनाम हुए हैं यूँ ही
क़ाफ़िला लूट रहे राह दिखाने वाले
हम भी बस ख़्वाब ही तो देख रहे हैं तब से
क्या ख़बर अब कहाँ हैं लोरी सुनाने वाले
बड़ी मुश्किल से हुआ ज़ख़्म-ए-कुहन ठीक मिरा
अब बुलाओ कहाँ हैं दिल को दुखाने वाले
अब कहाँ जाएँ समझ में ही नहीं आता कुछ
हर जगह लूट रहे अपना बताने वाले
इस मोहब्बत से हमें लगने लगा है डर अब
क्यूँकि दिल तोड़ रहे दिल में समाने वाले
मुंसिफ़ों ने किया है मुझको मवाली घोषित
अब बुलाओ कहाँ हैं उँगली उठाने वाले
— Prashant Kumar















