वो शख़्स हर तरह से मनाता रहा मुझे
मेरी निशानियाँ भी दिखाता रहा मुझे
देखा नहीं मुकर के मगर एक बार भी
रो रो के खिड़कियों से बुलाता रहा मुझे
इस में हवा का दोष नहीं है मिरी ख़ता
मेरा चराग़ ख़ुद ही बुझाता रहा मुझे
हर बार अच्छी किस्म का मैं बीज बन गया
मिट्टी में कितनी बार मिलाता रहा मुझे
नज़रों से दूर हो गया फिर उस के बा'द भी
एहसास अपनेपन का कराता रहा मुझे
तब बात और थी मगर अब बात और है
जब तक रहा वो अपना बताता रहा मुझे
मैं कब जहाँ में आया मुझे ख़ुद नहीं पता
जब तक रहा वो याद दिलाता रहा मुझे
याँ कौन क्या है यार मुझे ख़ुद नहीं पता
जब तक रहा वो दुनिया दिखाता रहा मुझे
मजबूत आदमी हूँ मैं फिसला कभी नहीं
अपनी अदाओं से वो लुभाता रहा मुझे















