कभी ख़ुद को दर्द-शनास करो कभी आओ ना

मुझे इतना तो न उदास करो कभी आओ ना

मिरी उम्र-सराए महके है गुल-ए-हिज्राँ से
कभी आओ आ कर बास करो कभी आओ ना

मुझे चाँद में शक्ल दिखाई दे जो दुहाई दे
कोई चारा-ए-होश-ओ-हवा से करो कभी आओ ना

इसी गोशा-ए-याद में बैठा हूँ कई बरसों से
किसी रफ़्त-गुज़श्त का पास करो कभी आओ ना

कहीं आब-ओ-हवा-ए-तिश्ना-लबी मुझे मार न दे
उसे बरखा बन कर रास करो कभी आओ ना

सदा आते जाते मौसम की ये गुलाब-रुतें
कोई देर हैं ये एहसास करो कभी आओ ना

— Aftab Iqbal Shamim

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