ज़ख़्म को फूल तो सर-सर को सबा कहते है

जाने क्या दौर है क्या लोग हैं क्या कहते हैं

अब कयामत है कि जिन के लिए रूक-रूक के चले
अब वही लोग हमें आबला-पा कहते हैं

कोई बतलाओ कि एक उम्र का बिछडा महबूब
इतिफाकन कहीं मिल जाए तो क्या कहते हैं

ये भी अंदाजे-सुखन है कि जफा को तेरी
गमज़ा-व-इशवा-व-अंदाज-ओ-अदा कहते हैं

जब तलक दूर है तू तेरी परसितश कर लें
हम जिसे छू न सकें उस को ख़ुदा कहते हैं

क्या ताज्जुब है कि हम अहले-तमन्ना को ‘फ़राज़’
वो जो महरूम-ए-तमन्ना हैं बुरा कहते हैं

— Ahmad Faraz

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