bujh chuke gar diyon ko jalaya to main ro padhoonga | बुझ चुके गर दियों को जलाया तो मैं रो पड़ूंगा

  - Faiz Ahmad

बुझ चुके गर दियों को जलाया तो मैं रो पड़ूंगा
याद को उसकी दिल ने बुलाया तो मैं रो पड़ूंगा

दर्द-ओ-ग़म में मिरा दिल कुछ इस क़दर घुल मिल गया है
ऐसे में अब किसी ने हँसाया तो मैं रो पड़ूंगा

दर्द, ग़म, ज़ख़्म, तन्हाई, हमराज़ हैं मेरे ये सब
मुझको इनसे जुदा गर कराया तो मैं रो पड़ूंगा

है दिया तेरा रौशन ये उम्मीद में लौटने की
तू ने आके इसे गर बुझाया तो मैं रो पड़ूंगा

मयकदे में मैं लड़ आया तेरे लिए सिर्फ़ 'अहमद'
जाम के आगे गर सर झुकाया तो मैं रो पड़ूंगा

  - Faiz Ahmad

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