ज़रा रहम खा मिरे ज़र्फ़ पर, ज़रा अपने रुख पे नक़ाब कर
मिरे 'इश्क़ की ज़रा क़द्र कर मिरी नीयतें न ख़राब कर
ये जहाँ नहीं है यक़ीन का, तिरे जैसे क़ल्ब-ए-मुबीन का
तिरा नेक होना सही नहीं, ज़रा आदतों को ख़राब कर
तिरे दम से ही है चमक रही मिरी दिल की गलीयों में रौशनी
अभी यूँँ न जा मुझे छोड़ के, मिरी ज़िंदगी न अज़ाब कर
ये जो दिन कटे हैं फ़िराक़ में, ये मिला गए मुझे ख़ाक में
कभी आ के बैठ क़रीब में, कभी दूरियों का हिसाब कर
जिसे देखकर ये तरब रहे, जिसे देखने की तलब रहे
मिरी चश्म-ए-तर को सुकून दे, मिरा ऐसा कोई तो ख़्वाब कर
तिरी याद में अब असर नहीं, मिरे दिल में फितना-ओ-शर नहीं
मैं बदल न जाऊँ मुझे है डर, मुझे फिर से आ के ख़राब कर
वो जो ज़िंदगी से अज़ीज़ थी तिरी बंदगी से मिली नहीं
तिरा किस तरह का ये अद्ल है, मिरी नेकियों का हिसाब कर
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Faiz Ahmad
our suggestion based on Faiz Ahmad
As you were reading Wahshat Shayari Shayari