jafaaen jitni mohabbat men kar gaii ho tum | जफ़ाएँ जितनी मोहब्बत में कर गई हो तुम

  - Faiz Ahmad

जफ़ाएँ जितनी मोहब्बत में कर गई हो तुम
वफ़ा की सारी हदों से गुज़र गई हो तुम

संँभाल के रखा था दिल में तुमको अपने पर अब
के मर गया है मिरा दिल सो मर गई हो तुम

बिछड़ के तुम से मिरी जाँ उजड़ गए हैं हम
बिछड़ के हम से मिरी जाँ निखर गई हो तुम

कहा था तुम ने मोहब्बत है कोई खेल नहीं
अब इसको खेल समझकर मुकर गई हो तुम

गुज़र गया तिरी खा़तिर मैं पुल सिरात से भी
न जाने छोड़ के मुझ को किधर गई हो तुम

गले से लग के मिरे सामने किसी और को
जिगर में मेरे हरे ज़ख़्म भर गई हो तुम

  - Faiz Ahmad

Mehboob Shayari

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