bahut hi aajiz-o-muflis dil-e-faakir ke saath | बहुत ही आजिज़-ओ-मुफ़्लिस दिल-ए-फ़कीर के साथ

  - Faiz Ahmad

बहुत ही आजिज़-ओ-मुफ़्लिस दिल-ए-फ़कीर के साथ
करेगा कौन भला 'इश्क़ इस हकीर के साथ

तिरी कु़यूद में सब को सुकून मिलता है
मज़ीद वक़्त गुज़ारा न कर असीर के साथ

हमें तो बाँध के रक्खा है जान कर इस में
हमारा कोई तअल्लुक़ नहीं शरीर के साथ

उन्हें तो साक़ी भी झुक कर शराब देता है
मुझे भी रब्त बढ़ाना है इक अमीर के साथ

ख़बर मिली तो मुझे दार पर चढ़ा देंगे
कि शाहज़ादी मोहब्बत न कर वज़ीर के साथ

तबीब ध्यान से खींच इस को ज़ख़्म गहरा है
कहीं ये दिल न निकल आए तेरे तीर के साथ

तिरी ये आँखें बसारत न छीन लें मेरी
तू बे-नक़ाब न आ अपनी चश्म-गीर के साथ

हमारे दिल के भी साथ अब वही किया 'अहमद'
जो 'इश्क़ ने किया था ग़ालिब और मीर के साथ

  - Faiz Ahmad

Doctor Shayari

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