mire haathon men ubhara hai ye naqsha kis tarah ka hai | मिरे हाथों में उभरा है ये नक़्शा किस तरह का है

  - Aisha Ayyub

मिरे हाथों में उभरा है ये नक़्शा किस तरह का है
मिरी आँखों में ठहरा है ये दरिया किस तरह का है

ये मेरा जिस्म है आज़ाद लेकिन रूह क़ैदी है
ख़ुदाया कोई बतलाए ये पिंजरा किस तरह का है

मिरी आहों को मेरे क़हक़हों ने ढाँक रक्खा है
मिरी इस लाश के ऊपर ये मलबा किस तरह का है

है जिन में बोझ दुनिया भर का मज़हब के हवालों से
मिरे बच्चों के काँधे पर ये बस्ता किस तरह का है

तुम्हें मालूम भी है कि वो निय्यत को परखता है
ये किस लालच में करते हो ये सज्दा किस तरह का है

मैं ख़ुद को ढूँडने निकली थी कुछ बिखरे वरक़ ले कर
तिरे अंदर हूँ जा पहुँची ये नक़्शा किस तरह का है

हमें आवाज़ देना है नबी को जानिब-ए-महशर
ख़ुदा आवाज़ दे जिस को वो बंदा किस तरह का है

  - Aisha Ayyub

Kitaaben Shayari

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